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कविताओं का गुलदस्ता

कलम से

संजीव कुमार "साथी"

भूमिका:

हर रचना मन की एक प्रार्थना है – कभी मौन में जन्म लेती है, कभी प्रश्न बनकर भीतर गूँजती है, और कभी शब्दों में ढलकर समर्पण बन जाती है।

दास की यह कविताएँ किसी साहित्यिक प्रयोग की नहीं, बल्कि एक गुरुसिख के हृदय की सच्ची अनुभूतियों की अभिव्यक्ति हैं। इनमें उस आत्मिक यात्रा की झलक है, जो "मैं कौन हूँ?" से आरंभ होकर "अपने सतगुरु माता सुदीक्षा जी महाराज के चरणों में आकर ठहरती है।" यहीं आकर मन शांत होता है, यहीं हर सवाल उत्तर में बदल जाता है।

हर कविता इस सत्य की साक्षी है — कि जब जीवन का केंद्र ‘मैं’ से हटकर इस सत्य, निरंकार पर टिकता है, तब भक्ति मात्र भाव नहीं, बल्कि अनुभव बन जाती है। इन कविताओं में निरंकार मिशन की शिक्षाओं का सार झलकता है — वह दृष्टि जो सिखाती है कि ईश्वर कोई दूर का स्वरूप नहीं, बल्कि वह चेतना है जो हर सांस, हर ज़र्रे में विद्यमान है।

जहां मन का अहं मिटता है, और हृदय पूर्ण श्रद्धा से कह उठता है — "जो कुछ भी है, वह सब यह ही है..."

•• कलम आपकी ••

क्या औकात है मेरी तुझको लिखने की

दिया है तूने रास्ता और हिम्मत इस पथ पर चलने की

लिखने की मुझे शक्ति देना, हर लफ्ज में अपनी ही भक्ति देना

हर शब्द बने "साथी" तेरे नाम का दर्पण, हर पंक्ति में हो तेरी कृपा का अर्पण

01

शब्द और रूहानियत

शब्द बोले, शब्द तोले, शब्द रुलाए, शब्द हँसाए,

हर स्वर, हर ताल, हर ध्वनि रूहानियत की छवि में ढल जाए।

शब्द हैं रास्ता, जो हमें असीम रब तक ले जाए

शब्द हैं सागर, जिसमें आत्मा डूबकर शांत हो जाए।

शब्द जलन की हैं चिंगारी, शब्द मोह की कसक सुलझाएँ।

शब्द ही मोक्ष की राह दिखाएँ, शब्द माया की परछाईं मिटाएँ।

शब्द दीपक बनकर आए, अंधकार में नूर फैलाएँ,

आशीर्वाद रूप में “साथी’’, मोक्ष की राह दिखाएँ।

शब्द तौलकर बोले भाई, सतगुरु मेरे की हैं सिखलाई,

मन, रूह और आत्मिक प्रकाश बनकर उतरे, शब्दों की गहराई।

— संजीव कुमार "साथी"
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