काव्य–संग्रह
संजीव कुमार प्रस्तुत करते हैं

रूहानीसफ़र

नज़्म और शायरी का संगम
भूमिका

अक्सर हम दुनिया की भीड़ में किसी साथी की तलाश करते हैं, लेकिन असल 'साथी' तो वह है जो हमारी रूह के सबसे करीब, उस परम चेतना के रूप में मौजूद है। मेरी यह किताब 'साथी' महज़ लफ़्ज़ों का संग्रह नहीं, बल्कि उस अंतर्यामी साथी की खोज और उससे संवाद की एक कोशिश है।

आध्यात्मिकता का मार्ग प्रेम और समर्पण का मार्ग है। इन नज़्मों और ग़ज़लों के ज़रिए मैंने उसी समर्पण को कागज़ पर उतारने का प्रयास किया है। कभी 'हद-ए-इश्क़' की बातें हैं, तो कभी अपने 'रहबर' और 'मुर्शिद' के चरणों में खुद को सौंप देने की तड़प। मेरा मानना है कि जब इंसान दुनिया की शोर-शराबे वाली राहें छोड़कर अपनी फितरत (स्वभाव) को पहचानने लगता है, तभी उसे उस असली सुकून का एहसास होता है। इस संकलन में मैंने कोशिश की है कि भाषा सरल और आधुनिक हो, ताकि रूहानियत के ये गहरे संदेश हर दिल तक आसानी से पहुँच सकें। हर मिसरे में बहर और लय की तकनीकी शुद्धता के साथ-साथ उस रूहानी कशिश को बनाए रखने का प्रयास किया गया है, जो पाठक को खुद के और भी करीब ले जाए। यह काव्य-संग्रह उन सभी जिज्ञासुओं को समर्पित है जो जीवन के शोर में इस 'अनहद नाद' को सुनने की कोशिश कर रहे हैं। मेरी प्रार्थना है कि ये शब्द आपके भीतर की शांति और इस 'परम साथी' से आपके मिलन का जरिया बनें।

समापन अंश मेरी इस लेखनी को सार्थकता तब मिली, जब मेरे मुर्शिद सतगुरु माता सुदीक्षा जी महाराज की अपार रहमत से मुझे इस 'बे-सूरत' (निराकार) के दीदार हुए। इनकी रहमत का ही यह असर है कि इन्होने शब्दों को एक नई रूह और नई दृष्टि प्रदान की। अभी तक जो कुछ भी लिख पाया हूँ , इन्ही की बख्शी हुई दिव्य दृष्टि का ही प्रताप है।

'साथी' के इन पृष्ठों में आपको वही तड़प और वही सुकून मिलेगा जो एक भक्त को अपने सतगुरु के चरणों में मिलता है। मेरी अरदास है कि यह किताब हर उस राही के लिए एक 'साथी' बने, जो उस अविनाशी सत्ता से जुड़ने की चाह रखता है।

यह काव्य-संग्रह उन सभी जिज्ञासुओं को समर्पित है जो जीवन के शोर में इस 'अनहद नाद' को सुनने की कोशिश कर रहे हैं।

संजीव कुमार 'साथी'
44काव्य-रचनाएँ

मेरे उजड़े हुए अरमान में रौनक होने लगी है,

कि तुम आए तो मेरे इश्क़ में बरकत होने लगी है।

रिवायत की लकीरों को बदल पाएँ तो कैसे,

ज़मीं जलती हो जब हर ओर, सँभल पाएँ तो कैसे।

नील गगन की चादर ओढ़े, धरती मुस्काती है,

भोर की पहली किरणों से दुनिया जग जाती है।

कुछ न रखूँ दिल में अपने, खोल दूँ हर बात आज,

नींद से जागें सारे ख़्वाब, टूटे मन का हर इक साज़।

जो था वो सब वहम निकला, जो तू है वही हक़ीक़त है,

मैं मिटकर तुझमें शामिल होऊँ—यही इश्क़ की इबादत है।

अजब दस्तूर दुनिया का यहाँ देखा-परखा है,

किसी के पास राहत है, किसी के पास धोखा है।

तू पास है, फिर भी मुझसे दूर क्यों है?

हर साँस में होकर भी नज़र से दूर क्यों है?

लोग कहते हैं, यह देखो कितना बदला,

अपनी पहचान का सामान बेच दिया मैंने।

जीने की तुमसे वजह मिल गई है,

वरना बेवजह ये ज़िंदगी जा रही थी।

मैं रास्ता नहीं खोया, मैं ख़ुद में उलझ गया,

जो सच सामने था, उसी से परे चल गया।

समय के पास इतना समय नहीं,

कि मुझे फिर से वक़्त दे सके।

जगत ये मंज़र जो भी है, महज़ इक ख़्वाब सा है,

नदी के नीर पे उतरी कोई परछाईं सा है।

ये जो आँखों को सच लगे, वो सच नहीं बस आदत है,

हर रूप यहाँ ठहरता नहीं, पल-भर की इबादत है।

तेरे वास्ते मेरा इश्क़ सूफ़ीयाना सा है,

हर साँस में तेरी महफ़िल का अफ़साना सा है।

साँसों की पूँजी मिली थी, हर पल इक नेमत थी,

आँखें रौशन रहीं मगर रूह मगर ख़ामोश थी।

जो दिखता है, वो भी तू है,

जो छुपा है, वो भी तू है।

इरादे जिनके पुख़्ता हों, नज़र जिनकी ख़ुदा पर हो,

वो हर हालात में चलते रहें, चाहे राह सख़्त, हवा ख़फ़ा हो।

हमने ख़ुद को ही आख़िरी ठिकाना मान लिया,

दर्द जो आया उसे भी बहाना मान लिया।

तेरी नज़र ने जो दिल में दबी आग जगा दी है,

अब हर धड़कन में वो बरकत है जो ठहरी-सी थी।

तू रहे तो सूनी राहें भी गुलों-सी महक जाएँ,

तेरी सूरत से ही मेरी हर मंज़िल का निशाँ बने।

तेरे होने का मैं हर पल ही दावा करता रहा,

फिर अपने ही यक़ीन को दरकिनार करता रहा।

मैंने ख़ुद को छोड़ा तो राह मिली,

नाम से हटे तो पहचान मिली।

हुक्म तेरे में रहना सीखूँ,

कड़वी बात भी सहना सीखूँ।

अमानत-ए-मन

यूँ रोज़-रोज़ आया न कर तू शिकायत,

मेरी हिफ़ाज़त का सिला चंद ही वादों में था

मेरा दरकिनार होना भी गुनाहों में था

मेरे हर हाल से तू वाकिफ़ है,

तू ही आरिफ़ है तू ही काशिफ़ है।

साँसों के इस ख़ज़ाने को, यूँ ही गँवाया न कर

सफ़र है मुख़्तसर, ख़ुद को बहुत उलझाया न कर

छत्तीस बरस की बातें, हासिल न हुआ इक हर्फ़

सदियाँ ही गुज़ार डालीं, समझा न गया कोई हर्फ़।

लफ़्ज़ों की बयानबाज़ी तो मैं कर ही लेता हूँ,

जीने की घड़ी आए तो कतरा ही जाता हूँ।

तू तो अंग-संग है मेरे, मैं ही तुझसे दूर था,

तेरी रहमतों के नूर में, मैं ही बे-नूर था।

इबादत दिखाने को, लफ़्ज़ों की मैं ढाल बुनता हूँ,

हक़ीक़त छुपाने को, अश्कों का मैं जाल बुनता हूँ।

अंधेरी हो गई गलियां, न वो पहले सा मंज़र है,

यहाँ हर शख़्स की मुट्ठी में छुपा नफरत का पत्थर है।

वही नाखून अक्सर ज़ख्म देते हैं,

जिन्हें पाला था हमने नाज़ से बरसों।

सुधरने का मेरा दावा हमेशा टूट जाता है

ख़सारे पर ख़सारा फिर न जाने क्यूँ ये होता है

मेरे करीब है तू, ये दावा हर बार करता हूँ,

क्यों हर बात की उम्मीद हर किसी से करता हूँ।

हदे-उम्र-ए-NYS ने दिया एहसास पीरी का

लगा इक ज़ख़्म दिल पर, वक़्त की इस बे-लकीरी का

चेहरे पे चेहरा लगा लिया मैंने,

अपने होने का एहसास खो दिया मैंने।

ख़ामोशी ने जब दिल से दिल की बात कही

तब समझ आया — आवाज़ की ज़रूरत क्या रही

हर घड़ी तुझको ही तकती हैं निगाहें मेरी,

पास होकर भी तरसती हैं निगाहें मेरी।

मेरे वजूद का ये हाल-ए-बयां तो देखिए

जमीं में धँस गए हैं जो वो निशां तो देखिए

वही बे-सूरत अब मेरे, सदा ही रूबरू है,

मुरशिद की बसीरत है, इसी की गुफ़्तगू है।

मिरा हर लफ़्ज़ था रूह की इक तहारत,

सुख़न-ए-ग़ैर बस 'जुरआ-ए-मज़मज़ा' थे।

झुका दूँ ये सर तेरे चरणों में आकर,

न बाकी रहे मुझमें मेरा कोई नाम।

हदे-इश्क़ अपनी भी क्या खूब निकली,

ज़माने को देख अपनी राहें बदल लीं।