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अंतरमन केशब्द
Reflections on spirituality, inner peace, and quiet & wisdom — window of Articles.
Article 01
अग्नि: संकल्प, उद्देश्य और आध्यात्मिक जागरण का दिव्य तत्व
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अग्नि: संकल्प, उद्देश्य और आध्यात्मिक जागरण का दिव्य तत्व
अग्नि — केवल तत्व नहीं, चेतना का जागरण
अग्नि को यदि हम केवल भौतिक दृष्टि से देखें तो वह प्रकाश और ताप देने वाला एक साधारण तत्व प्रतीत होती है, किन्तु जब हम…
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Article 02
अनकहे मलाल और मुरशद की मरहम: खामोश जख्मों से रूहानी सुकून तक का सफर
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अनकहे मलाल और मुरशद की मरहम: खामोश जख्मों से रूहानी सुकून तक का सफर
भूमिका: खामोशियों का शोर और अनकहे जख्मों की तासीर
जिंदगी का असली स्वरूप समय की रेखाओं में नहीं, बल्कि अनुभवों की गहराइयों में छिपा होता है। यह केवल बीतते हु…
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Article 03
आकाश: अनंत संभावनाओं का सूक्ष्म रहस्य
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आकाश: अनंत संभावनाओं का सूक्ष्म रहस्य
शून्यता का वास्तविक अर्थ — खाली नहीं, पूर्णता का आधार
शून्यता को सामान्यतः हम खालीपन या अभाव के रूप में देखते हैं, परन्तु आध्यात्मिक दृष्टि में यह किसी कमी…
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Article 04
आत्ममंथन सतगुरु माता सुदीक्षा जी महाराज की दृष्टि में आत्म-चेतना का जागरण
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आत्ममंथन सतगुरु माता सुदीक्षा जी महाराज की दृष्टि में आत्म-चेतना का जागरण
भूमिका
मानव जीवन एक अनमोल अवसर है — परमात्मा को जानने, स्वयं को पहचानने और संसार के उद्देश्य को समझने का। परंतु जब मनुष्य इस जगत के भौतिक मोहजाल में फँस जात…
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Article 05
आने वाला पल जाने वाला है
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आने वाला पल जाने वाला है
क्षणभंगुरता का शाश्वत सत्य और आध्यात्मिक चेतना
“आने वाला पल जाने वाला है”—यह वाक्य सुनने में जितना सरल और सहज प्रतीत होता है, अपने भीतर उतना ही गूढ़, रहस्यमय…
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Article 06
इंद्रियाँ और अंगों की भूमिका: जीवन की आधारशिला और इस परमात्मा से मिलन
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इंद्रियाँ और अंगों की भूमिका: जीवन की आधारशिला और इस परमात्मा से मिलन
भूमिका
मनुष्य का शरीर परमात्मा की सबसे विलक्षण और रहस्यमयी कृति है—एक ऐसा जीवंत मंदिर, जिसमें केवल रक्त, मांस और हड्डियाँ ही नहीं, बल्कि चेतना, प्रेम, करुणा…
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Article 07
इंद्रियों से अंतर्दृष्टि तक: काम, क्रोध, लोभ, मोह और अहंकार का आध्यात्मिक-विज्ञानात्मक संतुलन
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इंद्रियों से अंतर्दृष्टि तक: काम, क्रोध, लोभ, मोह और अहंकार का आध्यात्मिक-विज्ञानात्मक संतुलन
मनुष्य का शरीर केवल एक भौतिक संरचना नहीं, बल्कि चेतना का अत्यंत सूक्ष्म और जागरूक उपकरण है, जिसके माध्यम से जीवन स्वयं को अनुभव करता है। हमारी पाँच इंद्रियाँ—ने…
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Article 08
एक ही सिक्के के दो पहलू: जीवन और भक्ति का संतुलन
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एक ही सिक्के के दो पहलू: जीवन और भक्ति का संतुलन
"संसार भी हो हाथ में और दिल में बंदगी हो, दोनों पहलुओं के मेल का ही नाम 'साथी' ज़िंदगी हो।"
भूमिका
इन प्रवचनों का बीजारोपण तब हुआ जब मैं सत्संग की उस पा…
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Article 09
सबसे बड़ा रोग — क्या कहेंगे लोग
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सबसे बड़ा रोग — क्या कहेंगे लोग
भूमिका
मानव जन्म परम दुर्लभ है। यह केवल शरीर धारण करने का नहीं, बल्कि आत्मा के जागरण का अवसर है। परंतु इस जागरण में सबसे बड़ी बाधा कौन-सी है? न तो यह धन की…
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Article 10
शीर्षक: तत्व, चेतना और मुरशद — एक समग्र रूहानी दृष्टि
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शीर्षक: तत्व, चेतना और मुरशद — एक समग्र रूहानी दृष्टि
चेतना का मूल स्वरूप — “मैं हूँ” का प्रकाश
चेतना वह अदृश्य, सूक्ष्म और परम वास्तविक शक्ति है, जो जीवन को केवल सांसों की गतिविधि से उठाकर अनुभूति और अस्तित्व…
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Article 11
जल: जीवन और ब्रह्मांड का आध्यात्मिक प्रवाह
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जल: जीवन और ब्रह्मांड का आध्यात्मिक प्रवाह
ब्रह्मांड का मूल तत्व — जल रूपी चेतना का रहस्य
ब्रह्मांड के आदि की कल्पना करते ही हम एक ऐसे रहस्य के सामने खड़े हो जाते हैं, जहाँ न कोई आकार था, न नाम, न दि…
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Article 12
पृथ्वी तत्व — धैर्य, करुणा और आत्म-हीलिंग का दिव्य आधार
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पृथ्वी तत्व — धैर्य, करुणा और आत्म-हीलिंग का दिव्य आधार
पृथ्वी तत्व केवल एक विषय नहीं, बल्कि एक ऐसा गहन अनुभव है, जिसे जितना समझा जाए, उतना ही वह अपनी गहराइयों के नए आयाम खोलता जाता है। पहली दृष्टि में यह हमें मात्र…
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Article 13
प्रश्न बहुत गहरा और आध्यात्मिक-: ब्रह्म-ज्ञान प्राप्त हो गया, तब सेवा, सुमिरन और
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प्रश्न बहुत गहरा और आध्यात्मिक-: ब्रह्म-ज्ञान प्राप्त हो गया, तब सेवा, सुमिरन और
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सत्संग की क्या आवश्यकता**
ऊपर से देखने पर लगता है कि जब सत्य मिल…
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Article 14
प्रेम की स्वतंत्रता: निरंकार की दृष्टि से मोह और प्रेम
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प्रेम की स्वतंत्रता: निरंकार की दृष्टि से मोह और प्रेम
भूमिका
कभी-कभी जीवन अपनी सबसे गहरी सच्चाइयाँ किसी बड़े उपदेश, किसी भारी-भरकम ग्रंथ या किसी जटिल दर्शन के माध्यम से नहीं, बल्कि एक अत्यंत साधारण-से क्षण में…
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Article 15
फिर से जीना” और “पुनः जीना
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फिर से जीना” और “पुनः जीना
**“फिर से जीना” और “पुनः जीना” का भाव केवल बीते हुए पलों को याद करने का नहीं है, बल्कि सतगुरु के सान्निध्य में आध्यात्मिक पुनर्जन्म का है।यह पुनर्जन्म मन की अवस…
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Article 16
ब्रह्मांड और मानव: सूक्ष्म और स्थूल जगत का अद्भुत नाता
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ब्रह्मांड और मानव: सूक्ष्म और स्थूल जगत का अद्भुत नाता
मानव – सूक्ष्म ब्रह्मांड का अद्भुत दर्शन
मनुष्य केवल एक भौतिक शरीर नहीं है, बल्कि वह एक सूक्ष्म ब्रह्मांड है, जिसमें ब्रह्मांड के सभी तत्व, ऊर्जा केंद्र…
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Article 17
मन का विस्तार
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मन का विस्तार
जहां भी परमात्मा का जिक्र होता है, वहां शब्द अक्सर अधूरे पड़ जाते हैं। वहां कोई वाणी, कोई तर्क, कोई कथन पूरी तरह पर्याप्त नहीं होता। परमात्मा का अनुभव केवल महसू…
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Article 18
मस्तिष्क और ब्रह्मांड का आध्यात्मिक संबंध
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मस्तिष्क और ब्रह्मांड का आध्यात्मिक संबंध
मानव मस्तिष्क केवल एक जैविक अंग नहीं, बल्कि आध्यात्मिक अनुभवों और ब्रह्मांडीय चेतना का केंद्र भी है। आधुनिक न्यूरोसाइंस ने मस्तिष्क के **PAG (पेरिएक्वेडक्टल…
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Article 19
मानव शरीर और परमात्मा की अद्भुत रचना “जिस्म में छुपा है एक राज़-ए-ख़ुदा”
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मानव शरीर और परमात्मा की अद्भुत रचना “जिस्म में छुपा है एक राज़-ए-ख़ुदा”
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प्रस्तावना: शरीर — विज्ञान और अध्यात्म का संगम**
मानव शरीर केवल मांस, रक्त और हड्डियों का बना एक साधारण ढांचा नहीं है; यह एक जीवित रहस्य है—एक ऐसी अद्भुत कृत…
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Article 20
मोक्ष, माया और आत्मज्ञान का सुंदर संगम (निरंकारी दृष्टिकोण से)
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मोक्ष, माया और आत्मज्ञान का सुंदर संगम (निरंकारी दृष्टिकोण से)
जब बात मोक्ष की होती है,तो वह उस परम आनन्द की अनुभूति है,जहाँ परमपिता परमात्मा के सिवा और कुछ भी दिखाई नहीं देता। मनुष्य जब अनेक जन्मों के बाद फिर से मानव जीवन…
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Article 21
वायु: मितव्ययिता और संतुलन का आध्यात्मिक आयाम
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वायु: मितव्ययिता और संतुलन का आध्यात्मिक आयाम
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प्रस्तावना: वायु का रहस्य**
वायु—जो दिखाई नहीं देती, परंतु हर क्षण हमारे अस्तित्व की आधारशिला बनी हुई है—एक ऐसा सूक्ष्म तत्व है, जिसकी उपस्थिति इतनी स्वाभावि…
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Article 22
संसार और अध्यात्म का समन्वित वेदांतिक दृष्टिकोण
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संसार और अध्यात्म का समन्वित वेदांतिक दृष्टिकोण
मानव जीवन के विषय में वेदांत का मूल प्रश्न यह नहीं है कि मनुष्य क्या करता है, बल्कि यह है कि वह किस भाव से करता है और किस बोध में जीता है। ऋग्वेद में मनुष्य को…
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Article 23
विषय: सूक्ष्म अहंकार एक अध्यात्मिक दृष्टि (गहन और मौलिक)
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विषय: सूक्ष्म अहंकार एक अध्यात्मिक दृष्टि (गहन और मौलिक)
मनुष्य के जीवन में अहंकार सबसे सूक्ष्म और घातक शत्रु है। यह बाहरी रूप से कभी स्पष्ट नहीं दिखता, लेकिन धीरे-धीरे हमारे विचार, भावनाएँ और कर्म इसकी जाल में फंस जा…
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Article 24
स्वार्थ का अर्थ—स्वयं का अर्थ - स्वार्थ का अर्थ—स्वयं का अर्थ
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स्वार्थ का अर्थ—स्वयं का अर्थ - स्वार्थ का अर्थ—स्वयं का अर्थ
भूमिका
“स्वार्थ” शब्द सुनते ही हमारे मन में प्रायः एक नकारात्मक अर्थ उभर आता है—स्वयं के लाभ के लिए दूसरों को हानि पहुँचाना, केवल अपने सुख की चिंता करना। कि…
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